भारतीय विदेश नीति पर रहेगी नजर

हर्षवर्धन शृंगला, ( पूर्व विदेश सचिव व सांसद )

हम नए साल में प्रवेश कर गए हैं। इस समय दुनिया में अनिश्चितता, शक्ति संतुलन में बदलाव और बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति बनी हुई है। साल के पहले दिन ही चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ताइवान संबंधी बयान ने स्पष्ट कर दिया कि यह वर्ष काफी जटिल स्थितियां जनने जा रहा है। जिनपिंगका दो टूक लहजे में यह कहना कि ताइवान का चीन में विलय होकर रहेगा और ताइवानी राष्ट्रपति का अपनी संप्रभुता से किसी किस्म का समझौता करने से इनकार करना , साल 2026 में टकराव की आशंकाओं की एक बानगी भर है। ऐसे माहौल में भारत की विदेश नीति पर सबकी निगाह रहने वाली है।

हालांकि, अपने उद्देश्य की स्पष्टता, रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय- वैश्विक हितों को साधने वाली साझेदारियों के प्रति हमारी नीति पूरी तरह साफ है। इस साल अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ, जापान, ऑस्ट्रेलिया, आसियान, अफ्रीकी संघ और खाड़ी के देशों से रिश्ते हमारी विदेश नीति के केंद्र में रहेंगे भारत- अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी, खासकर रक्षा और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में स्थिर रहने की उम्मीद है। अमेरिका के साथ व्यापार और टैरिफ पर जारी मतभेदों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मित्रता और ट्रंप के सबसे करीबी सलाहकारों में से ,एक सर्जियो गोरको भारत में अमेरिकी राजदूत नियुक्त किए जाने से दोनों देशों के संबंधों को नई गति मिलने की संभावना है। अमेरिका ने अपनी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति 2025 में भारत के साथ वाणिज्यिक संबंधों और हिंद-प्रशांत रणनीतिक संबंधों को एक साथ विकसित करनेके प्रति भी रुचि जताई है।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन दिनों रूस से बाहर कम यात्रा करते हैं। इसके बावजूद बीते दिसंबर में उनकी भारत यात्रा हुई। यह अपवाद था। उस यात्रा ने भारत के साथ रूसके संबंधों की अहमियत को एक बार फिर रेखांकित किया। यूरेशियाई आर्थिक संघ के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते के तहत रूस से व्यापारिक रिश्ते को विस्तार देने पर इस साल फोकस रहेगा।

चीन के साथ संबंधों में कुछ विवादों और सीमा- संघर्ष के कारण गतिरोध की स्थिति बनी हुई है। बढ़ते व्यापार घाटे के अलावा दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में उसके बढ़ते कदमों के कारण भी कई चुनौतियां पैदा हुई हैं, फिर भी उसके साथ रिश्ते सामान्य बनाने की दिशा में इस वर्ष नई कोशिशें हो सकती हैं। ब्रिटेन और ओमान के साथ तरजीही व्यापार समझौतों से भारतीय निर्यात, पूंजी निवेश और भारतीय युवाओं के लिए वैश्विक आवागमन के द्वार खुलने के संकेत हैं। इसी तरह, गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय नेताओं की भारत यात्रा और यूरोपीय संघ के साथ लंबे समय से प्रतीक्षित आर्थिक समझौते को संपन्न कराने की दिशा में उठाए गएकदमों से यूरोपीय संघ के साथ हमारा जुड़ाव बढ़ेगा। भारतीय विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण कारक ‘कनेक्टिविटी’ रहा है। इससे आर्थिक एकीकरण और रणनीतिक साझेदारियों में घनिष्ठता आती है। इस साल हमारा ध्यान ‘भारत- पश्चिम एशिया यूरोप आर्थिक गलियारे’ (आईएमईसी) परकेंद्रित होगा, जो एकीकृत परिवहन, ऊर्जा और डिजिटल नेटवर्क के जरिये इन देशों के साथ हमारे संबंधों को काफी मजबूत कर सकता है। इसके लागू होने से व्यापारिक कुशलता बढ़ेगी, आपूर्ति श्रृंखला मजबूत हो सकेगी और भारत उभरती क्षेत्रीय मुहिम में अहम भूमिका निभा सकता है। पश्चिम एशिया से शुरू होने वाली ‘लुक वेस्ट’ नीति सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ओमान समेत खाड़ी के अन्य देशों व इजरायल के साथ भारत के संबंधों को और मजबूती देगी।

आसियान के साथ भारत का जुड़ाव उसकी ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का मुख्य स्तंभ बना रहेगा, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, आर्थिक एकीकरण और समुद्री सुरक्षा के साझा हितों पर आधारित है। सहयोग के क्षेत्र में व्यापार व निवेश, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती, डिजिटल कनेक्टिविटी और क्षमता निर्माण भी शामिल हैं। ‘भारत- अफ्रीका फोरम’ के आयोजन से अफ्रीकी संघ के साथ भारत की साझेदारी को इस साल नई ऊर्जा मिलेगी। यह दशकों के विकास सहयोग और ‘दक्षिण- दक्षिण एकता पर आधारित है। क्षमता निर्माण, विकास, वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल सार्वजनिक ढांचा और कनेक्टिविटी के मामले में सहयोग के अतिरिक्त शांति व सुरक्षा के साथ बढ़ता व्यापार- निवेश इस साझेदारी का अभिन्न अंग बना रहेगा।

भारत के निकट पड़ोस में घट रही घटनाओं को कम करके नहीं आंका जा सकता, इसलिए भारत ‘पड़ोस पहले की अपनी नीति को इस साल भी प्राथमिकता देना जारी रखेगा। हमें नहीं भूलना चाहिए कि पनबिजली परियोजनाओं से लेकर नेपाल में बुनियादी ढांचा निर्माणकी पहल के साथ-साथ श्रीलंका व मालदीव से समुद्री व रक्षा सहयोग ने एक क्षेत्रीय भागीदार के रूप में हमारी स्थिति को मजबूत बनाया है। भारत बांग्लादेश में हो रहे राजनीतिक और संस्थागत बदलाव से तालमेल बिठा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में विदेश मंत्री एस जयशंकर का शरीक होना इसका ठोस प्रमाण है। भारत नेपाल के साथ अपने आर्थिक संबंधों को और गहरा कर रहा है, तो भूटान के प्रमुख रणनीतिक भागीदार के रूप में अपनी भूमिका को मजबूती दे रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में आगे बढ़कर कार्रवाई करने के प्रयासों ने भारत की स्थिति एक भरोसेमंद भागीदार के रूप में मजबूत बनाई है।

जाहिर है, वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत के तहत दुनिया के गरीब देशों में कल्याणकारी कार्यों में योगदान भारतीय विदेश नीति का अहम पहलू है। भारत ‘ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज के रूप में उभरा है। भारत इस क्षेत्र की विकास प्राथमिकताओं, न्यायसंगत विकास और वैश्विक संस्थानों में विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की वकालत करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस और यूक्रेन के नेताओं के साथ सीधे संपर्क में हैं। उन्होंने जी-20 और संयुक्त राष्ट्र जैसे बड़े वैश्विक मंचों पर भीइससंघर्ष को समाप्त कराने में संवाद का समर्थन किया है। इस तरह से वह कूटनीतिक तौर पर सभी पक्षों से जुड़े हैं। ये तमाम कवायदें भारत के इस विश्वास को पुष्ट करती हैं कि संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही शांति संभव है। साल 2026 में हमारा कदम सतर्क, संतुलित और आशावादी रहेगा। इस तरह, बहुध्रुवीय दुनिया में हमारी विदेश नीति के केंद्र में रणनीतिक स्वायत्तता, राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास ही रहेगा।

हर्षवर्धन शृंगला, ( पूर्व विदेश सचिव व सांसद )

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